उम्र सिर्फ 6 साल, लेकिन हौसला किसी चैंपियन से कम नहीं….

In Jan Ka Josh, नजरिया
February 25, 2026
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जूनियर मुंबई श्री 2026 में छोटे रचित पांचाल ने दिखाई हिम्मत और अनुशासन की मिसाल

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मुंबई – Jan Sandesh Haryana
उम्र महज छह साल, लेकिन मंच पर आत्मविश्वास किसी अनुभवी पहलवान से कम नहीं। सामने थे उम्र में तीन गुना बड़े, मजबूत और प्रशिक्षित पुरुष बॉडीबिल्डर, फिर भी छोटे रचित पांचाल बिना डरे मंच पर डटे रहे। यह दृश्य जूनियर मुंबई श्री 2026 प्रतियोगिता का था, जिसने दर्शकों को भावुक भी किया और प्रेरित भी। जब रचित मंच पर उतरे, तो यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि दो साल पहले रुके हुए एक सपने की नई शुरुआत थी।

पिता के हादसे से बदली जिंदगी

मार्च 2024 में रचित के पिता उमेश पांचाल, जो खुद रजत पदक विजेता और खेलप्रेमी हैं, मुंबई श्री प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे थे। लेकिन प्रतियोगिता से महज दो दिन पहले हुए एक गंभीर हादसे ने सब कुछ बदल दिया। उनके बाएं पैर की हड्डी में गंभीर चोट आई, जिसके चलते दो ऑपरेशन हुए और उन्हें करीब आठ महीने तक बिस्तर पर रहना पड़ा। उस एक हादसे ने पिता का सपना रोक दिया, लेकिन उसी घर में एक नया सपना आकार लेने लगा।

दर्द से जन्मी प्रेरणा

अपने पिता को दर्द से जूझते और फिर से खड़े होने की कोशिश करते देख रचित ने सिर्फ व्यायाम ही नहीं सीखा, बल्कि अनुशासन, धैर्य और जिद भी सीखी। वह पिता के साथ अभ्यास करने लगा, हर एक्सरसाइज को ध्यान से देखने और समझने लगा। प्रशिक्षक विशाल परब के मार्गदर्शन में रचित को उसी गंभीरता से तैयार किया गया, जैसे किसी प्रोफेशनल एथलीट को किया जाता है।

पहला मंच, साहस की जीत

अप्रैल 2025 में रचित ने पहली बार मंच पर कदम रखा। वह पल किसी पदक का नहीं, बल्कि साहस और आत्मविश्वास की जीत का था। वहीं से उसके सफर ने रफ्तार पकड़ी।

22 फरवरी 2026: जब उम्र बेमानी हो गई

22 फरवरी 2026 को छह साल के रचित ने 55 किलो श्रेणी के Under-23 वर्ग में हिस्सा लिया। मंच पर उसके साथ 30 से अधिक अनुभवी और मजबूत बॉडीबिल्डर मौजूद थे। लेकिन रचित डरे नहीं।
उन्होंने पूरे आत्मविश्वास के साथ हर पोज़ दिया, अपनी ताकत और संतुलन दिखाया और पूरे संयम के साथ मंच पर खड़े रहे — मानो यह मंच उन्हीं के लिए बना हो।

सादा जीवन, मजबूत अनुशासन

रचित एक साधारण जीवन जीने वाला बच्चा है।
वह घर का बना खाना खाता है, सलाद पसंद करता है और अनहेल्दी फूड से दूर रहता है। दौड़ना, साइकिल चलाना और नियमित अभ्यास उसकी दिनचर्या का हिस्सा है।

पिता के लिए नई जीत

आज उमेश पांचाल उस हादसे को हार नहीं मानते। उन्हें अपने बेटे में नई शुरुआत और नई ताकत दिखाई देती है। वे कहते हैं, “कुछ सपने खत्म नहीं होते, वे बस अगली पीढ़ी में नए रूप में पूरे होते हैं।”

सीख जो हर उम्र के लिए है

रचित की कहानी यह सिखाती है कि
ताकत उम्र से नहीं, बल्कि दिल, अनुशासन और इरादों से मापी जाती है।


जन संदेश न्यूज़ | प्रेरणा डेस्क


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