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हरियाणा के नाथों ने अपनी परवर्ती भक्ति-धाराओं को यथेष्ट रूप में प्रभावित किया

हरियाणा के नाथों ने अपनी परवर्ती भक्ति-धाराओं को यथेष्ट रूप में प्रभावित किया

 प्रतिशोध की अग्नि में जलती हुई लूणा ने अपने पति राजा शालिवाहन के समक्ष पूरण पर दोषारोपण का सिलसिला शुरू कर दिया और एक बार तो यह भी आरोप लगाया कि पूरण ने उससे बलात्कार का प्रयास किया था। राजा शालिवाहन उन दिनों लूणा के प्रेम पाश में बंधा हुआ था। उसने बिना किसी व्यापक जांच के पूरण के हाथ-पांव कटवाकर कुएं में फैंकने के आदेश दे दिए। 

उन्हीं दिनों महंत मच्छेंद्रनाथ उधर से गुज़रे। उनकी दृष्टि जब कुएं में तड़पते पूरण पर पड़ी तो उन्होंने वहां से उसे निकालकर उसकी सेवा सुश्रुषा कराई और बाद में उसे नाथ पंथ में दीक्षित कराया गया। नवदीक्षित को सिद्ध चौरंगीनाथ का नाम दिया गया। यद्यपि कुछ विद्वान इस कथानक को मान्यता नहीं देते लेकिन सिद्ध चौरंगीनाथ द्वारा ही रचित ‘प्राण सांकली’ में इस घटना का उल्लेख है। ‘प्राण सांकली’ के अतिरिक्त श्रीनाथ अष्टक व हठयोग प्रदीपिका आदि कृतियां, सिद्ध चौरंगीनाथ के नाम से ही जुड़ी हैं।

इस महान नाथपंथी सिद्ध ने समाज में अंधविश्वास व पाखण्डी साधुओं, जोगियों की भी भरपूर निंदा की। उन्हीं का एक दोहा है-

टूका खाया, मगर मचाया, जैसा सहर का कूत्ता/

जोग जुगति की खबर न जाणी, कान $फड़ाई बिगता//

इस तथ्य की भी पुष्टि होती है कि सिद्ध चौरंगीनाथ ने 12 वर्ष तक हरियाणा के अस्थल बोहर में कठोर तप किया था और उन्होंने पागल-पंथ का भी प्रवर्तन किया था। उनके कठोर तप एवं हठयोग-साधना से वह तपस्थली योग मंदिर कहलाने लगी।

इस संबंध में हरियाणा के ही एक प्रखर विद्वान डॉ. पूर्णचंद शर्मा ने विशेष विवरण दिया।

‘सिद्ध चौरंगीनाथ के पश्चात हरियाणा की नाथ-परम्परा को समृद्ध करने का श्रेय सिद्ध शिरोमणि बाबा मस्तनाथ जी को जाता है। इन्होंने अस्थल बोहर के शापग्रस्त मठ का जीर्णोद्वार करवाया। इनका समय विक्रम संवत् 1764 से 1864 तक माना जाता है। इनके जन्म के विषय में कबीर की भांति ही एक जनश्रुति प्रचलित है कि ये किसरेटी (रोहतक) के एक निस्संतान रहबारी (ऊंट पालने वाले) को मार्ग में पड़े मिले थे। अत: ये उन्हीं के पुत्र कहलाए। संवत् 1776 में इन्होंने बाबा नरमाई का शिष्यत्व ग्रहण किया, जिसका उल्लेख मस्तनाथ जीवन-चरित्र में हुआ-

बहुरि सकत निज ग्रामें आए, तहां एक योगेश्वर आए।

बाबा नाथ नाम नरमाई, जिनका पंथ कहाब आई।।

मास पक्ष शुभ तिथि विचारा, लग्न नक्षत्र योग वर वरवारा।

चोटी ले मुण्डन करवाया, मंत्रविधि सहित गुरु सुनाया।।

सत्तरा सै छेहत्तर संवत् वीरा, मस्तनाथ भए शिष्य गंभीरा।

मस्तनाथ जी आरम्भ में 12 वर्ष तक औघड़ रूप में रहे। तदुपरांत कान फड़वा कर दर्शनी सिद्ध कहलाए। इनके दर्शनी और औघड़ दोनों रूपों की जानकारी इनके जीवन चरित्र में इस प्रकार दी गई है-

अभय दान दीना गुरु नाथा, शिष्य नवायो गुरु पद माथा।

द्वादस वर्ष लौं औघड़ राखा, सेवा टहल परम रस चाखा।।

नगर पहेवा कान फड़ाए, फेर दरसनी नाथ कहलाए।

सत्तरा सै अठासी संवत वीरा, मस्तनाथ ने लीना चीरा।।

सरस्वती नदी के तट पर ही नाथ-पंथी सिद्धों का प्रमुख केंद्र था, जहां इनके बारह के बारह पंथ प्रचार के लिए जुड़ते थे। इसका वर्णन मस्तनाथ चरित्र में इस प्रकार मिलता है-

धूना बारह पंथ का, रहा बहुत गंभीर।

एक सहस्र जोगी तपैं, नदी सरस्वती तीर।।

बाबा मस्तनाथ के जीवन को रेखांकित करते हुए डॉ. देवेंद्र सिंह विद्यार्थी ने लिखा है कि चौरंगी की परम्परा में अस्थल बोहर के महंत मस्तनाथ जी भी अच्छे कवि हुए हैं। इनका समय 18वीं शताब्दी का उत्तराद्र्ध माना जाता है। इनकी ख्याति एक समाज सुधारक के नाते लोकमानस में गहरी पैठी हुई है। इनका रचा कोई भी ग्रंथ नहीं मिलता। गिनती के पद लोगों को याद हैं। इनकी भाषा और अभिव्यक्ति पर हरियाणवी लोक साहित्य की गहरी छाप है।

बाबा मस्तनाथ ने अपने पंथ का प्रचार करने के लिए देश के विभिन्न प्रदेशों का भ्रमण किया और दूर-दूर तक अपने संदेश को पहुंचाया। अपनी महासमाधि से पूर्व इन्होंने अस्थल बोहर मठ के महंत की दीक्षा सिद्ध योगिराज तोतानाथ को दी। बाबा मेघनाथ, योगी मोहरनाथ, योगी चेतनाथ, बाबा पूर्णनाथ, महंत श्रेयोनाथ तथा महंत चांदनाथ आदि महंतों ने अपने पंथ को गतिमान रखा। इस समय योगी बालक नाथ इस गद्दी पर हैं।

इस मठ के अंतिम दो नाथों ने राजनीति के क्षेत्र में भी पदार्पण किया। महंत श्रेयोनाथ हरियाणा के मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री रहे और महंत चांदनाथ संसद सदस्य रहे। इन नाथों के अथक प्रयास के कारण अस्थल बोहर के मठ ने एक विशाल वट-वृक्ष का रूपधारण कर लिया है। सम्प्रति यह विविध प्रकार की शिक्षा का केंद्र बन गया है। यहां तक कि इसके तत्वावधान में बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय बहुआयामी शिक्षा लेकर लोक-कल्याण के क्षेत्र में अपना नाम कमा रहा है। 

इसके अतिरिक्त आज भी हरियाणा के कोने-कोने में नाथों के डेरे विद्यमान हैं। उनके पास अकूत सम्पत्ति है। कोथ (जींद), कोरड़पाई (करनाल), कनोह (फतेहाबाद), अम्बाला, पिहोवा, थानेश्वर, कैथल, सिरसा, हिसार, लेघां, भिवानी, बवानीखेड़ा, पेटवाड़, दादरी, नारनौल, रिवाड़ी, बालंद, बलम्बा आदि इनके प्रमुख ठिकाने हैं। 

हरियाणा के नाथों ने अपनी परवर्ती भक्ति-धाराओं को यथेष्ट रूप में प्रभावित किया है। यहां के सू$फी और संत कवियों ने नाथपंथ में प्रचलित प्रतीकात्मक शब्दावली, गूढ़ोक्तियों, उल्टबासियों आदि का प्रयोग करते हुए गुरु-महिमा को रेखांकित किया है। इन्होंने काम, क्रोध, मोह, माया आदि को त्यागपत्र दया, धर्म, संतोष, तप-त्याग आदि को अपनाने पर बल दिया है। इन नाथपंथी सिद्धों ने हरियाणा के लोक साहित्य, संस्कृति व लोकमानस पर अमिट छाप अंकित की है। पूरण भगत व गोपीचंद-भरथरी द्वारा ‘जोग’ धारण करने की कथाएं हरियाणा के लोकगीतों, लोकनाट्यों तथा लोकगाथाओं में सर्वत्र गाई जाती है। इन्होंने हरियाणा में नव जागरण एवं लोक-चेतना का जो मंत्र फूंका है वह सदा अविस्मरणीय रहेगा। इतिश्री

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