हजारों दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहरों को सहेजे उपेक्षा से जूझ रहा संग्रहालय

संगरिया। इतिहास केवल किताबों में दर्ज घटनाओं तक सीमित नहीं होता, बल्कि समाज की स्मृतियों, संस्कृति, परंपराओं और पीढ़ियों से चली आ रही धरोहरों में भी जीवित रहता है। संगरिया स्थित सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय ऐसी ही ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों का अनमोल केंद्र है, जहां पुरानी प्रतिमाएं, दुर्लभ कलाकृतियां, पारंपरिक औजार, हथियार, बर्तन, वाद्य यंत्र और नायाब वस्तुएं संजोकर रखी गई हैं। इसके बावजूद यह संग्रहालय आज भी उपेक्षा और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
हरियाणा-पंजाब की सीमा के पास स्थित ग्रामोत्थान विद्यापीठ परिसर में बना यह संग्रहालय भारतीय संस्कृति, लोकजीवन और इतिहास का जीवंत दस्तावेज है। संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1938 में शिक्षा संत स्वामी केशवानंद जी के प्रयासों से की गई थी। बताया जाता है कि देशभर की यात्राओं के दौरान उन्होंने पुरानी वस्तुओं, ऐतिहासिक सामग्री और दुर्लभ धरोहरों को एकत्र कर संग्रहालय में सुरक्षित रखा।
संगरिया स्थित सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय इतिहास, संस्कृति और लोकजीवन की ऐसी अनमोल धरोहर है, जो वर्षों से हजारों दुर्लभ वस्तुओं को अपने भीतर सहेजे हुए है। ग्रामोत्थान विद्यापीठ परिसर में स्थित यह संग्रहालय केवल पुरानी वस्तुओं का संग्रह नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली अतीत से जोड़ने वाला जीवंत केंद्र है।
संग्रहालय में प्राचीन प्रतिमाएं, हथियार, पारंपरिक औजार, बर्तन, वाद्य यंत्र, हस्तशिल्प सामग्री, दुर्लभ कलाकृतियां और देश-विदेश से लाई गई ऐतिहासिक वस्तुएं संरक्षित हैं। यहां रखी वस्तुएं भारतीय संस्कृति, ग्रामीण जीवन, कला और इतिहास की समृद्ध परंपरा को दर्शाती हैं।
संग्रहालय के प्रवेश द्वार पर स्थापित वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की प्रतिमा आगंतुकों को आकर्षित करती है। भीतर प्रवेश करते ही ऐसा प्रतीत होता है मानो इतिहास के पन्ने जीवंत होकर सामने आ गए हों। हर वस्तु अपने दौर की कहानी कहती नजर आती है।
ग्रामोत्थान विद्यापीठ, संगरिया के सचिव सुखराज सिंह सलवारा ने कहा कि सर छोटूराम स्मारक संग्रहालय पूरे क्षेत्र की ऐतिहासिक पहचान है। संस्था अपने स्तर पर इसके संरक्षण और रखरखाव का प्रयास कर रही है, लेकिन इसे पर्यटन मानचित्र पर स्थान दिलाने के लिए सरकार, पर्यटन विभाग और पुरातत्व विभाग का सहयोग जरूरी है।
उन्होंने कहा कि यदि इस संग्रहालय को व्यवस्थित प्रचार-प्रसार, आधुनिक संरक्षण तकनीक, गाइड सुविधा और सरकारी सहायता मिले तो यह संगरिया को पर्यटन क्षेत्र में नई पहचान दिला सकता है। विद्यार्थियों, शोधार्थियों और इतिहास प्रेमियों के लिए यह संग्रहालय महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।
स्थानीय लोगों का भी मानना है कि ऐसी धरोहरों का संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज का भी कर्तव्य है। यदि समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो कई दुर्लभ वस्तुएं क्षति का शिकार हो सकती हैं।
जन संदेश हरियाणा की अपील है कि संगरिया के इस ऐतिहासिक संग्रहालय को संरक्षण, पहचान और पर्यटन से जोड़ने के लिए सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर आगे आएं।


