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गन्ने की बुवाई का नया तरीका! इस तकनीक से होगी लाखों की कमाई, किसान होंगे मालामाल

गन्ने की बुवाई का नया तरीका! इस तकनीक से होगी लाखों की कमाई, किसान होंगे मालामाल

भारत में गन्ने की खेती को “सफेद सोना” कहा जाता है, क्योंकि यह फसल किसानों की आय का अच्छा स्रोत है. एक बार किसान इस फसल की खेती कर अच्छा- खासा उत्पादन पा लेते हैं, लेकिन बदलते समय और बढ़ती लागत के बीच किसानों को नई तकनीकों को ओर बढ़ना जरुरी हो गया है. ऐसे में अगर किसान वाइड रो स्पेसिंग (Wide Row Spacing) तकनीक से खेती करते हैं, तो वह अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं और साथ ही प्रति एकड़ में लाखों रुपये तक की कमाई कर सकते हैं.

क्या है वाइड रो स्पेसिंग तकनीक?

वाइड रो स्पेसिंग तकनीक में गन्ने की बुवाई पारंपरिक तरीके से अलग होती है. सामान्य तौर पर जहां गन्ने की कतारों के बीच दूरी 2 से 2.5 फीट रखी जाती है, वहीं इस नई विधि में यह दूरी बढ़ाकर करीब 4 फीट कर दी जाती है. इस बदलाव से पौधों को पर्याप्त धूप, हवा और पोषक तत्व मिलते हैं, जिससे उनकी वृद्धि बेहतर होती है. पौधे मजबूत और स्वस्थ बनते हैं, जिससे उत्पादन की गुणवत्ता भी बढ़ती है.

कम पानी में ज्यादा उत्पादन

गन्ना एक पानी प्रधान फसल में आती है. ऐसे में किसान अगर वाइड रो स्पेसिंग (Wide Row Spacing) तकनीक को अपनाकर खेती करते हैं, तो वह फसल की पानी की खपत को आधा कर सकते हैं. जहां पारंपरिक खेती में एक एकड़ गन्ने के लिए 18 से 20 लाख लीटर पानी की जरूरत होती है, वहीं वाइड रो स्पेसिंग में यह काम सिर्फ 9 से 10 लाख लीटर पानी में पूरा हो जाता है.

बीज और लागत में भारी कमी

इस तकनीक का किसानों को बड़ा फायदा है बीज की कम आवश्यकता. पारंपरिक खेती में जहां एक एकड़ में करीब 35 क्विंटल गन्ने का बीज लगता है, वहीं इस विधि में केवल 18 से 20 क्विंटल बीज से ही गन्ने की बुवाई हो जाती है, जिससे किसानों की शुरुआती लागत में कमी आती है और साथ ही गुड़ाई, निराई और सिंचाई मशीनों की मदद से आसानी से किए जा सकते हैं. इससे मजदूरी का खर्च कम हो जाता है.

इंटरक्रॉपिंग से अतिरिक्त आय

अगर किसान भाई वाइड रो स्पेसिंग तकनीक के माध्यम से खेती करते हैं, तो कतारों के बीच अधिक जगह बचती है, जिसका उपयोग किसान अतिरिक्त फसल उगाने के लिए कर सकते हैं. इसे इंटरक्रॉपिंग कहा जाता है. साथ ही किसान इस खाली जगह में दालें, सब्जियां या अन्य कम अवधि की फसलें उगा सकते हैं, जो 3 से 4 महीनों में तैयार हो जाती हैं. इससे मुख्य फसल के साथ-साथ अतिरिक्त आमदनी भी सुनिश्चित होती है.

सरकार का मिल रहा है समर्थन

सरकार भी इस तकनीक को बढ़ावा देने के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. कई राज्यों में किसानों को वाइड रो स्पेसिंग अपनाने पर आर्थिक सहायता दी जा रही है. पहले जहां प्रति एकड़ 3000 रुपये की सब्सिडी दी जाती थी, अब इसे बढ़ाकर 5000 रुपये तक कर दिया गया है. कृषि विभाग का मानना है कि इस तकनीक से न केवल उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि गन्ने की गुणवत्ता और उसमें मौजूद रस की मात्रा भी बेहतर होगी.

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