मुंबई। “मां” शब्द को सिर्फ जन्म तक सीमित न रखकर उसे करुणा और सेवा का पर्याय बनाने वाली सिंधुताई सपकाल को यूं ही “महाराष्ट्र की मदर टेरेसा” नहीं कहा जाता। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन अनाथ और बेसहारा बच्चों के नाम कर दिया और करीब 1400 बच्चों को गोद लेकर उन्हें मां का स्नेह, आश्रय और शिक्षा दी।
अभावों में बीता बचपन
सिंधुताई सपकाल का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा जिले में एक गरीब चरवाहे परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने संघर्ष देखे। मात्र 9 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया, जिसके कारण वे चौथी कक्षा से आगे पढ़ नहीं सकीं।
गर्भावस्था में ठुकराया परिवार ने
जीवन का सबसे कठिन दौर तब आया जब गर्भावस्था के दौरान ससुराल और मायके—दोनों ने उन्हें ठुकरा दिया। समाज से बहिष्कृत सिंधुताई ने अकेले ही एक बेटी को जन्म दिया। जीविका के लिए उन्हें रेलवे स्टेशन पर भीख मांगनी पड़ी।
संघर्ष से सेवा तक का सफर
यही पीड़ा और अकेलापन उनके जीवन का मोड़ बना। स्टेशन पर अनाथ बच्चों की दुर्दशा देखकर उन्होंने तय किया कि वे सिर्फ अपनी बेटी की नहीं, बल्कि हर बेसहारा बच्चे की मां बनेंगी। इसके बाद उन्होंने जीवनभर हजारों बच्चों का पालन-पोषण किया और उन्हें एक बेहतर भविष्य दिया।
700 से अधिक सम्मान
मानवता और समाजसेवा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए सिंधुताई सपकाल को 700 से अधिक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उनका जीवन संघर्ष, साहस और करुणा का जीवंत उदाहरण है।
सिनेमा में भी अमर हुई कहानी
उनके जीवन पर आधारित मराठी फिल्म ‘मी सिंधुताई सपकाल’ भी बनी, जिसे देश-विदेश में सराहा गया और जिसने उनकी प्रेरणादायक यात्रा को व्यापक मंच दिया।
मानवता की मिसाल
सिंधुताई सपकाल सिर्फ एक समाजसेविका नहीं थीं, बल्कि वे उस ममता की प्रतिमूर्ति थीं जिसने यह सिखाया कि मां बनने के लिए जन्म नहीं, बल्कि दिल का बड़ा होना जरूरी है।
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