2026 के बाद बदलेगा चुनावी नक्शा, दिग्गजों की पकड़ कमजोर और नए चेहरे मजबूत हो सकते हैं
चंडीगढ़। Jan Sandesh News
हरियाणा में प्रस्तावित परिसीमन को लेकर भले ही अभी औपचारिक घोषणा न हुई हो, लेकिन इसके राजनीतिक असर ने अभी से सियासी जमीन हिला दी है। यह सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह सत्ता संतुलन, जातीय गणित, क्षेत्रीय प्रभाव और नेताओं के राजनीतिक भविष्य का पुनर्लेखन साबित हो सकता है।

क्यों इतना अहम है यह परिसीमन?
हरियाणा में लंबे समय से विधानसभा सीटें 90 और लोकसभा सीटें 10 ही हैं, जबकि जनसंख्या और शहरीकरण में बड़ा बदलाव आ चुका है। गुरुग्राम–फरीदाबाद बेल्ट, सोनीपत, पंचकूला और यमुनानगर जैसे क्षेत्रों की आबादी कई जिलों से अधिक हो चुकी है।
परिसीमन इन्हीं असंतुलनों को ठीक करेगा—और यहीं से राजनीति बदलनी शुरू होगी।
विधानसभा 117 की हुई तो क्या बदलेगा?
यदि विधानसभा सीटें 117 तक पहुंचती हैं, तो इसका सीधा असर तीन स्तरों पर दिखेगा:
1️⃣ मौजूदा विधायकों की “सेफ सीट” खत्म
कई मौजूदा विधायक दशकों से जिन क्षेत्रों पर पकड़ बनाए हुए हैं, वे क्षेत्र टूट सकते हैं या आरक्षित हो सकते हैं।
➡️ इससे स्थायी विधायक संस्कृति कमजोर होगी।
➡️ टिकट वितरण में पार्टी नेतृत्व का दबदबा बढ़ेगा।
2️⃣ नए नेताओं के लिए एंट्री पॉइंट
नई सीटों का मतलब है—
- नए चेहरे
- युवा और सामाजिक संगठनों से जुड़े नेता
- स्थानीय प्रभाव वाले गैर-पारंपरिक उम्मीदवार
यह बदलाव खासतौर पर शहरी इलाकों में देखने को मिलेगा, जहां अब तक सीमित सीटों के कारण अवसर नहीं मिल पाता था।
3️⃣ जातीय समीकरण फिर से सेट होंगे
आरक्षित सीटें बढ़ने की संभावना है, जिससे दलित और पिछड़ा वर्ग राजनीति में प्रतिनिधित्व तो बढ़ेगा, लेकिन
➡️ कई सवर्ण और प्रभुत्वशाली जातियों के नेताओं की रणनीति गड़बड़ा सकती है।
लोकसभा सीटें 13 हुईं तो किसे फायदा, किसे नुकसान?
लोकसभा सीटों के बढ़ने का सबसे बड़ा असर राष्ट्रीय राजनीति में हरियाणा की भूमिका पर पड़ेगा।
- केंद्र में सरकार बनाने में हरियाणा का महत्व बढ़ेगा
- क्षेत्रीय नेताओं की ताकत बढ़ेगी
- हाई-प्रोफाइल सीटों का पुनर्गठन होगा
विश्लेषकों का मानना है कि
➡️ कुछ बड़े चेहरे अपनी पारंपरिक सीट खो सकते हैं
➡️ वहीं कुछ नए क्षेत्र “स्टार सीट” बनकर उभरेंगे
सत्तापक्ष बनाम विपक्ष: कौन कितना तैयार?
सत्तापक्ष
- संगठनात्मक मजबूती का लाभ
- नए चेहरों को आगे लाने का मौका
- लेकिन एंटी-इनकंबेंसी नए क्षेत्रों में खतरा बन सकती है
विपक्ष
- पुराने गढ़ टूटने से नुकसान
- लेकिन नए क्षेत्रों में फ्रेश नैरेटिव बनाने का मौका
- यदि जातीय संतुलन साधा गया तो अप्रत्याशित लाभ संभव
सबसे बड़ा खतरा: आंतरिक बगावत
परिसीमन के बाद सबसे ज्यादा खतरा किसी पार्टी को विपक्ष से नहीं, अपने ही नेताओं से होगा।
- टिकट कटने का डर
- सीट बदलने की मजबूरी
- आरक्षण के कारण बाहर होने की आशंका
➡️ यही कारण है कि आने वाले समय में दल-बदल, बगावत और निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या बढ़ सकती है।
यह चुनाव नहीं, राजनीतिक रीसेट है
हरियाणा का परिसीमन केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि यह पूरे राजनीतिक सिस्टम का रीसेट बटन साबित हो सकता है।
जो नेता इसे समय रहते समझकर तैयारी करेगा—वही भविष्य की राजनीति में टिक पाएगा।
Jan Sandesh Exclusive Analysis
आने वाले महीनों में परिसीमन की हर आहट हरियाणा की सियासत को नई दिशा देती नजर आएगी।

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