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क्या एआई से हो रहा है ‘डिजिटल डिमेंशिया’? जानें असर और बचाव

क्या एआई से हो रहा है ‘डिजिटल डिमेंशिया’? जानें असर और बचाव
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तेजी से बढ़ते एआई और डिजिटल टूल्स ने हमारी जिंदगी आसान जरूर बनाई है, लेकिन इसका एक साइड इफेक्ट भी सामने आ रहा है, जिसे ‘डिजिटल डिमेंशिया’ कहा जा रहा है। इसका मतलब है कि हम धीरे-धीरे अपनी याददाश्त और सोचने की क्षमता का इस्तेमाल कम कर रहे हैं। जब हर छोटी-बड़ी जानकारी के लिए हम तुरंत फोन या एआई का सहारा लेते हैं, तो दिमाग को मेहनत करने की जरूरत ही नहीं पड़ती।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जब हम खुद याद करने या सोचने की कोशिश नहीं करते, तो मस्तिष्क के न्यूरॉन्स के बीच बनने वाले कनेक्शन कमजोर होने लगते हैं। यही कनेक्शन हमारी मेमोरी और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत बनाते हैं। लगातार डिजिटल निर्भरता के कारण यह प्रक्रिया धीमी पड़ सकती है।

इसका असर सिर्फ याददाश्त तक सीमित नहीं है। कई लोग अब एआई को एक तरह का डिजिटल साथी मानने लगे हैं और घंटों उससे बातचीत करते हैं। इससे असली मानवीय संपर्क कम होता जा रहा है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानों के बीच बातचीत से मिलने वाला ऑक्सीटोसिन हार्मोन तनाव को कम करता है, जबकि डिजिटल इंटरैक्शन यह लाभ नहीं दे पाता। इसके चलते अकेलापन, एंग्जायटी और तनाव जैसी समस्याएं बढ़ सकती हैं।

हालांकि इससे बचाव के आसान तरीके भी हैं। सबसे पहले ‘एक्टिव रिकॉल’ की आदत डालें, यानी किसी जानकारी को सर्च करने से पहले कुछ मिनट खुद याद करने की कोशिश करें। इससे दिमाग सक्रिय रहता है। रोजाना थोड़ा-बहुत हाथ से लिखना भी फायदेमंद होता है, क्योंकि यह न्यूरॉन्स को सक्रिय करता है और मेमोरी को मजबूत बनाता है।

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