आज राजनीति का दुर्भाग्य है कि डॉ. लोहिया, चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवी लाल और चंद्रशेखर जैसे भद्र पुरुषों का अकाल सा हो गया है

विपक्षी दलों का तालमेल एकता का ताना-बाना ही न रह जाए

‘इंडिया’ ये जोड़ केवलमात्र भाजपा के खिलाफ बस अपने राजनीतिक अस्तित्व बचाने से ज्यादा कुछ भी नहीं दिखता

ये जो नया-नया गठबंधन ‘इंडिया’ बना है, इनमें शामिल अधिकांश वही नेता हैं चले हुए कारतूस दिख रहे हैं

2024 बहुत अनोखा साल होगा भारतीय राजनीति के लिए। एक तरह से हम ये भी कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति नए बदलाव की ओर बढ़ रही है। ये भी कहा जा सकता है कि ये दौर दलों के ध्रुवीकरण का चल पड़ा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने का सपना देखने में मग्न है। एक तरफ जहां मिशन 2024 के लिए 26 विपक्षी दल एकजुट हुए हैं वहीं और भाजपा नीत राजग में 38 दलों का साथ आना संकेत हैं कि भारतीय राजनीति गठबंधन के नए दौर में प्रवेश कर ही चुकी है लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि ताकतवर भाजपा के सामने विपक्षी कवायद की जमीनी हकीकतें कितनी हैं। कांग्रेस के ‘इंडिया’ समूह में शामिल अधिकतर दल खुद का पोषित करने वाले, मौका देखकर पैतरा बदलने वाले हैं। इस समूह के अधिकतर नेताओं का सपना प्रधानमंत्री बनने का है कि मौका मिलने पर इनमें से कोई त्याग करने वाला नहीं है। ना इस समूह ने अभी तक कोई भी नीति-रीति निर्धारित की है और जब बात टिकटों की आएगी तो ये भानुमति का कुनबा कितना धैर्य दिखा पाएगा इस पर सभी को संदेह होना लाजिमी है। भाजपा की कूटनीति के आगे विपक्ष का टिक पाना मुश्किल लगता है। अब जब 2024 के आम चुनाव में एक साल से भी कम वक्त रह गया है, भाजपा ने अपने दम पर बहुमत के साथ केंद्र में लगातार तीसरा असाधारण कार्यकाल हासिल करने के लिए अपना भव्य गेमप्लान जाहिर कर दिया है, जो 2014 और 2019 में हासिल उसके संपूर्ण दबदबे का ही एक और दोहराव है, इस मिशन को तत्काल अंजाम देना उस वक्त और जरूरी हो गया जब 15 विपक्षी दल भाजपा को हराने की गरज से अपनी-अपनी ताकत को सामूहिक शक्ति में बदलने के तरीकों पर विचार करने 23 जून को बिहार की राजधानी पटना में इक_ा हुए। अपना मकसद हासिल करने के लिए भाजपा ने चौंकाने और झटका देने वाली रणनीति का सहारा लिया है। 27 जून के मध्य प्रदेश के चुनाव में भाजपा ने विपक्ष पर सोचा-समझा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि उनकी विरोधी पार्टियां जिस भी राज्य में सत्ता में होती है ‘‘भ्रष्टाचार की गारंटी’’ देती है। एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने आरोपों को सिरे से झटक दिया और उनके भाषण को यह कहकर खारिज कर दिया कि प्रधानमंत्री विपक्ष की बढ़ती एकता पर अपनी कुंठा जाहिर कर रहे हैं। मगर पांच दिन बाद 2 जुलाई को उलटे पवार ही अपने जख्म सहलाते देखे गए जब उनके भतीजे अजित पवार ने एनसीपी को तोडक़र महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुआई वाली भाजपा-शिवसेना सरकार में शामिल होने का फैसला किया। भाजपा ने 2019 में अपने दम पर 303 और एनडीए के साथ 353 सीटें जीती थीं। भारत की सबसे चतुर-सुजान पार्टी अच्छी तरह जानती है कि महज सामान्य चुनावी अभियान के बूते वह ऐसी हिमालयी चोटियां फिर फतह नहीं कर सकती। बदले समीकरणों की वजह से भाजपा के लिए अनिवार्य हो गया है कि वह तीन लक्ष्य हासिल करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का सहारा ले। ये तीन लक्ष्य हैं- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए रिकॉर्ड तीसरा कार्यकाल पक्का करना, अपने दम पर बहुमत की गारंटी करना ताकि सहयोगी दलों पर निर्भर न रहना पड़े और नए भूभागों में पैर पसारना। इसके लिए उसने सीटों और राजनैतिक पूंजी से भरपूर छह या सात राज्यों की पहचान की है। उसने कई मोर्चों पर एक साथ अदावतों का सूत्रपात कर दिया और लड़ाई के मुगदर सीधे दुश्मन खेमे में ले गई। इसे ऑपरेशन तोड़-फोड़ कहा जा रहा है। असल में भारतीय राजनीति में पिछले तीन दशक से राजनीतिक दल कंसोलिडेट हो रहे हैं। अब तक व्यवहार में गठबंधन का स्वरूप बहुदलीय रहा है, लेकिन बेंगलुरु में जिस तरह 26 विपक्षी दलों ने ‘इंडिया’ (इंडियन नेशनल डवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) नाम से गठबंधन बनाया है और जवाब में नई दिल्ली में भाजपा नीत राजग का 38 दलों का जमघट लगा, यह संकेत है कि अब गठबंधन दो धड़ों का रूप ले रहा है। अब लड़ाई को सीधे आमने सामने की बनाने की तैयारी है और इस तैयारी में अभी देश के 64 दल दो धड़ों में बंट चुके हैं। विपक्षी एकता की एक कवायद में सबसे जरूरी बात जो समझने की है वो ये है कि इंडिया नाम से सामने आए गठबंधन में तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव की पार्टी भारत राष्ट्र समिति, आंध्र प्रदेश के सीएम जगनमोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआरसी, ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल और यूपी की पूर्व सीएम मायावती की बसपा सरीखे गिन-चुने दल बचे हैं, जो किसी धड़े में नहीं है। इसके अलावा हरियाणा से इंडियन नेशनल लोकदल के सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला तक की भी अनदेखी की गई जो थर्ड फ्रंट के विचार को न केवल लागू करवाने की ताकत रखते हैं बल्कि इनमें से अधिकतर नेताओं के साथ उनके व्यक्तिगत संबंध भी हैं। राजग में ऐसे दलों की संख्या 24 है जिनका लोकसभा में कोई सांसद नहीं है। नये ‘इंडिया’ दल में भी ऐसे 10 दल हैं जिनका किसी भी सदन में कोई सांसद नहीं है। इसका यह मतलब नहीं कि इन दलों का कोई जनाधार ही नहीं है। सत्ताधारी अच्छी तरह समझते हैं कि जाति या विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले दलों के पास खुद जीतने लायक वोट प्रतिशत बेशक ना हो, पर इनका 2-4 प्रतिशत वोट बैंक कड़े चुनावी संघर्ष में बाजी पलटने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। देश में अब तक वोटों का पोलराइजेशन होता रहा है, लेकिन अब दलों का पोलराइजेशन शुरू हुआ है। एक धड़े का नेतृत्व जहां भाजपा कर रही है, वहीं दूसरे धड़े का नेतृत्व कांग्रेस करने की कोशिश कर रही है लेकिन अभी उसके मंजिल तक पहुंचने में कई तरह के गतिरोध है और ऐसे सवाल भी हैं जिनका सामना जानबूझकर नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में श्री राहुल गांधी का सजायाफ्ता होने पर सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जाना उनके चुनावी भविष्य पर प्रश्नचिह्न है। कांग्रेस का सांगठनिक चरित्र देशव्यापी होने के चलते उसे ध्रुवीकृत विपक्ष की धुरी के रूप में देखा जा रहा है लेकिन उसकी व्यक्तिगत हालत बेहद खराब है। राजस्थान और छत्तीसगढ में उनकी सरकारें हैं पर 2024 तक वो रहेंगी भी या नहीं ये किसी को नहीं पता है। एक ले देकर कर्नाटक ही कांग्रेस की ताकत बचा है और अगर हरियाणा की बात करें तो कांग्रेस के नेता आपस में चार गुटों में बंटकर पहले ही भाजपा की राह आसान करने में तुले हैं और लोकसभा में कांग्रेस हरियाणा से कहीं है ही नहीं है ले-देकर राज्यसभा से एक सांसद दीपेंद्र हुड्डा के रूप में कांग्रेस के पास है। कांग्रेस की कप्तानी में विपक्ष का जहाज टाइटेनिक भी बन ही जाएगा इसलिए कमान नीतीश के हाथों में देने की तैयारी दिखाई दे रही है।अगर आप उस दौर को देखें जब आजादी के वक्त कांग्रेस अकेली पार्टी थी, जिसकी पूरे देश में साख थी तो आप भ्रम में रह जाएंगे। साठ के दशक के बाद बेशक डीएमके, अकाली दल आदि के रूप में क्षेत्रीय दल का उदभव होने लगा, लेकिन यह दौर एकल पार्टी का ही रहा। सत्तर के दशक में भारतीय राजनीति का अपराधीकरण शुरू हुआ, जिसमें चुनाव जीतने के लिए अपराधियों का सहारा लिया जाने लगा। अस्सी के दशक तक कांग्रेस का प्रभाव मलिन होने लगा और वैकल्पिक राजनीति के रूप में क्षेत्रीय दलों व राष्ट्रीय दल के रूप में भाजपा का उदय शुरू हुआ। वर्ष 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा देश पर थोपी गई इमरजेंसी ने कांग्रेस की एकल राजनीति का अवसान कर दिया। वर्ष 1977 में देश में पहली बार जनता पार्टी की गैर कांग्रेस सरकार बनी। जेपी की संपूर्ण क्रांति ने कांग्रेस को जरूर उखाड़ फेंका, लेकिन राजनीति का मजबूत गैर कांग्रेस विकल्प नहीं दिया। 1980 में कांग्रेस ने वापसी की। यह वो दौर भी था, जब अपराधी छवि वाले लोग सीधे राजनीति में प्रवेश करने लगे और लगभग सभी दल अपराधी छवि के नेताओं को टिकट देने लगे। अस्सी से नब्बे के बीच राजनीति और अपराधियों का नेक्सस काफी फला-फूला। यह दशक भारतीय राजनीति का ट्रांसफ्यूजन काल माना जा सकता है, जिसमें एक तरफ जहां कांग्रेस के खिलाफ वैकल्पिक राजनीति के रूप में क्षेत्रीय दल व गठबंधन का युग शुरू हो रहा था, राजनीति में जातीय व धार्मिक उन्माद खुलेआम प्रवेश कर रहे थे, वहीं आपराधिक नेता राजनीति में जड़ जमा रहे थे। इस दौर में सभी गठबंधन कांग्रेस के खिलाफ बन रहे थे। 1991 में सरकार बनाने के लिए सांसदों का खरीद-फरोख्त भी शुरू हो गया था और ये भी सच ही है कि कांग्रेस ने ही इस परंपरा को शुरू किया था। वर्ष 1991 से ही भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर भी शुरू हुआ, और इसी के साथ भारतीय राजनीति का कॉरपोरेटीकरण भी शुरू हो गया। ब्रिटेन व अमेरिका से कॉरपोरेट पॉलिटिक्स की चली हवा भारत पहुंच गई। वर्ष 1990 में सोवियत संघ रूस के टूटने के बाद विश्व में विचारधारा के अंत की भी घोषणा होने लगी। इसका असर राजनीति पर भी दिखा और राजनीति से वैचारिक प्रतिबद्धता के अंत का आरंभ हुआ। अब राजनीति केवल सत्ता की होने लगी। नब्बे के दशक से लेकर अब तक की राजनीति के केंद्र में गठबंधन अपरिहार्य रहा। ये गठबंधन सुविधा के भी बने, राजनीतिक पसंद के भी बने, लेकिन हर गठबंधन सत्ता के लिए ही बना। गठबंधन ने राजनीतिक अस्थिरता भी पैदा की, कमजोर सरकारें भी दीं। वर्ष 1980 से 1990 के बीच का दौर ऐसा भी रहा जिसमें देश में बहुतायत में परिवारवादी, वंशवादी, व्यक्तिवादी दल अस्तित्व में आए और लोकतंत्र के नाम पर परिवार की सत्ता को मजबूत किया। वर्ष 1999 से लेकर अब तक दो दशक को भारतीय राजनीति में गठबंधन के स्वर्णिम काल के रूप में माना जाना चाहिए। इस दौरान गठबंधन में भी स्थिर सरकार बनी। 2014 के बाद से भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति के तौर तरीकों ने देश में बिखरे विपक्ष के सामने राजनीतिक अस्तित्व खड़ा कर दिया है। हिंदुत्व, विकास, जनकल्याण, सोशल इंजीनियरिंग, भारतीय अस्मिता और राष्ट्रवाद की राजनीति ने भाजपा को वटवृक्ष बना दिया है। अभी के विपक्षी दल इसमें बहुत पीछे छूट चुके हैं। जाति, बिरादरी की राजनीति से अब लोग ऊब चुके हैं, जबकि वे अभी तक इसी में फंसे थे। करीब तीन दशक की जातिगत-क्षेत्रगत राजनीति ने निराश ही किया है। रोजी, रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पानी, सुरक्षा, खेती-किसानी के प्रश्नी ज्यों के त्यों हैं। परिवारवादी दलों ने भ्रष्टाचार को संस्थागत बना दिया, जिसने देश को घुन की तरह खोखला किया। विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ में शामिल सभी दलों को दस से बीस-तीस-चालीस-पचास साल तक शासन का अवसर मिला है, लेकिन वे समावेशी विकास व परिवर्तन की मिसाल पेश नहीं कर सके हैं, इसलिए विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ भाजपा के खिलाफ केवल अपने राजनीतिक अस्तित्व बचाने की खातिर सत्ता के लिए जमावड़ा भर ही है, क्योंकि इनमें शामिल अधिकांश नेता चले हुए कारतूस हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने समाजवाद के नाम पर राज्य, देश व संविधान को छला है और लोकतंत्र के नाम खुद को पोषित किया है। आज भारत की राजनीति का दुर्भाग्य है कि डॉ. राम मनोहर लोहिया, चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल और चंद्रखेशर जैसे भद्र पुरुषों का एक तरह से अकाल ही हो गया है। असल में आज के समय में सत्ता के लिए विपक्षी दलों का ध्रुवीकरण शुरू हुआ है, अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो आगे दो ध्रुवीय गठबंधन की राजनीति का नव दौर देखने को मिलेगा। भविष्य में छोटे दलों के बड़े में विलय की घटनाएं भी देखने को मिलेंगी, क्यों कि राजनीति के कॉरपोरेटीकरण के बाद से पार्टियों का अर्थशास्त्र बदल गया है, जिसमें छोटे दलों का सरवाइव करना मुश्किल होता जाएगा। बहरहाल, राष्ट्रवाद की पिच पर भाजपा को मात देने आए विपक्ष के ‘इंडिया’ ने भाजपा को ‘इंडिया बनाम भारत’ की सियासत को तेज करने का अवसर दे दिया है। विपक्षी एकता तभी संभव है, जब कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के नेता सीटों के बंटवारे पर सहमत हों, जो राज्यों में संख्या बल के आधार पर होना चाहिए। राजस्थान, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेष के अलावा मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में विपक्षी नेताओं को कांग्रेस को बड़ा हिस्सा देना होगा, जहां भाजपा के साथ उसका सीधा मुकाबला है। इसी तरह कांग्रेस और अन्य दलों को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, दिल्ली में केजरीवाल, तमिलनाडु में स्टालिन, महाराष्ट्र में शिवसेना (उद्धव ठाकरे), उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव जैसे नेताओं के लिए मैदान खुला छोडऩा होगा, जहां उनका वर्चस्व है। नीतीश कुमार संयुक्त विपक्ष का चेहरा बन सकते हैं, क्योंकि वे क्षेत्रीय दलों को स्वीकार्य होंगे और सोनिया और राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेताओं का उनके प्रति नरम रुख है, जो लालू प्रसाद यादव की पहल के कारण संभव हो सका। यदि वोटों के बंटवारे को टाला जा सकता है, तो अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पटखनी देने के लिए विपक्षी एकता की यह एक बड़ी ताकत होगी। विपक्षी दलों को चिंतन करके यह स्पष्ट नीति निर्धारित करनी होगी कि विपक्ष किस प्रकार से सत्तासीन दल का सामना करने के लिये एकरूप सर्वदलीय कार्यक्रम का अनुसरण करेगा। विपक्षी दलों के समूह को अपने विघटन का बचाव करते हुए यह निर्धारित करना होगा कि वह किस आधार व तर्कशील नीति के तहत सत्ताधारी दल का विरोध करेगा क्योंकि केवल प्रधानमंत्री के खिलाफ टिप्पणियों से चुनावी माहौल सार्थक नहीं बन सकता।


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