लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज़ हो गई है। सभी प्रमुख दलों ने ज़मीनी स्तर पर तैयारी शुरू कर दी है। इस बार चुनावी रणनीति के केंद्र में दलित वोट बैंक नजर आ रहा है, जिसे सत्ता की राह का अहम कारक माना जा रहा है।
बीजेपी की रणनीति: दलित महापुरुषों के जरिए सामाजिक संवाद
भारतीय जनता पार्टी ने 2027 को ध्यान में रखते हुए एक विशेष रणनीति तैयार की है। इसके तहत पार्टी ने 15 दलित महापुरुषों का कैलेंडर तैयार कराया है। इन महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि के अवसर पर सालभर दलित समाज के साथ संवाद और संपर्क कार्यक्रम आयोजित करने की योजना है।
इस सूची में कांशीराम से लेकर संत रविदास तक कई प्रमुख नाम शामिल हैं। पार्टी का फोकस किसी दलित नेता या प्रतीक के साथ टकराव से बचते हुए सम्मान और सहभागिता का संदेश देने पर है। यही वजह है कि हाल के समय में बीजेपी ने मायावती पर सीधे हमलों से परहेज किया है।
योगी सरकार का फोकस: योजनाओं की ज़मीनी पहुंच
योगी आदित्यनाथ सरकार भी समाज के हर वर्ग तक सरकारी योजनाओं की जानकारी और लाभ पहुंचाने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का मानना है कि लाभार्थी राजनीति के जरिए दलित और वंचित तबकों का भरोसा मजबूत किया जा सकता है।
अखिलेश यादव की PDA पॉलिटिक्स
विपक्ष में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की राजनीति PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण पर टिकी है। अखिलेश यादव लगातार सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी के मुद्दों को उठाकर यादवों के साथ-साथ गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।
क्यों अहम है दलित वोट बैंक?
यूपी की राजनीति में दलित वोट बैंक को हमेशा निर्णायक माना गया है।
- बीजेपी लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का लक्ष्य लेकर चल रही है
- सपा सत्ता में लौटने के लिए सामाजिक गठबंधन पर दांव लगा रही है
ऐसे में दलित समाज का रुझान 2027 के चुनावी नतीजों की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल यूपी की राजनीति रणनीति, सामाजिक संतुलन और प्रतीकों के दौर में प्रवेश कर चुकी है। आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि कौन-सी पार्टी अपने संदेश को ज़मीन तक बेहतर ढंग से पहुंचा पाती है।





